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ब्रम्हाण्ड का नाभि स्थल कर्कराज मंदिर
उज्जैन। पौराणिक और धार्मिक नगरी उज्जैन में वैसे तो हर मंदिर के पीछे उसका प्राचीन महत्व जुड़ा है लेकिन शिप्रा किनारे स्थित कर्कराज मंदिर पौराणिक महत्व के अलावा पूरे ब्रम्हाण्ड का ध्यान आकर्षित करने वाला इकलौता ऐसा मंदिर है जहां वर्ष में एक बार साया भी साथ छोड़ देता है।
इस मंदिर का उल्लेख इसलिये भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि यहीं से पंचक्रोशी यात्रा के बाद अष्टतीर्थ यात्रा भी प्रारंभ होती है।महाराजा विक्रमादित्य के नौ रत्नों में आर्य भट्ट और वराहमिहिर द्वारा अपने गणितीय और ज्योतिषीय ज्ञान के आधार पर इस स्थान की खोज की जिसके बाद महाराजा विक्रमादित्य के समय कर्कराज मंदिर का निर्माण हुआ।
मंदिर के पुजारी पं. कौशल व्यास चर्चा में बताते हैं कि यह स्थान पृथ्वी का नाभि स्थल है। यहां अविभाजित भारत को केन्द्र मानकर ज्योतिषीय गणना की गई जिसके आधार पर मान्य हुआ कि यहां से कर्करेखा गुजरती है। खास बात यह कि 21 व 22 जून को दोपहर में यहां साया भी साथ छोड़ देता है। वर्ष 1994 में तत्कालिन कलेक्टर भूपाल सिंह द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया साथ ही स्थान का महत्व बताने वाले स्तंभ पर शिलालेख भी लगवाये थे।
साया भी छोड़ देता है साथ, यहीं से शुरू होगी अष्टतीर्थ यात्रा
यह हैं अष्टतीर्थ
पंचक्रोशी यात्रा पूरी करने के बाद श्रद्धालु कर्कराजेश्वर महातीर्थ पहुंचते हैं। यहां से छोटा पुल स्थित केदारनाथ, गोंसा स्थित रणजीत हनुमान, कालभैरव, सिद्धनाथ, कालियादेह महल, मंगलनाथ दर्शन करते हुए नागचंद्रेश्वर मंदिर पहुंचकर यात्रा पूर्ण करते हैं।
भंवरियों के छत्ते और मकडिय़ों के जाले लगे
दो दिनों बाद कर्कराज मंदिर से अष्टतीर्थ यात्रा प्रारंभ होने वाली है जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेंगे, लेकिन वर्तमान में यहां मंदिर के अंदर भंवरियों के छत्ते और मकडिय़ों के जाले लगे हैं। पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां का पहुंच मार्ग भी कच्चा है जिस कारण लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।
